अर्पित करें सुमन हृदय के, करें अर्चना श्री आदि माँ की,
शीश झुकाए किया जाे समर्पण, बहे चैतन्य मिले निर्मलानन्द ॥

करते ही शुद्ध इच्छा हृदय में, बहे अविरल प्रेम निश्चल क्षण में,
मिले यह सुखद परम अनुभूति, कि माँ ही विद्यमान है कण कण में ॥

सदैव माँ से करें प्रार्थना, माँ तेरी कृपा है जब इतनीै,
ले विश्व में धर्म ये निर्मल, माध्यम बने सभी हम जिसका ॥

है अद्भुत दिया ज्ञान श्री माँ ने, याेग सहज सिखलाया,
मिटा अहम्, अहंकार वा सारा, माँ की है अनुकम्पा ॥

निर्मला माँ की कृपा है इतनी, करें हम बस मिल अनन्य भक्ति,
है संतुलन इच्छा और क्रिया, पात्र बने अनंत आशीष का ॥

ये ज्याें करी प्रार्थना माॅं से, बरसे माँ तेरी कृपा बरसे,
जागे कुण्डलीनी खुले सभी चक्र, निर्विचार हाेते क्षण भर में ॥